शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

बौद्ध कला की बेमिसाल कृतियां

सांची के स्तूप दूर से देखने में भले मामूली अ‌र्द्ध गोलाकार संरचनाएं लगें लेकिन इसकी भव्यता, विशिष्टता व बारीकियों का पता सांची आकर देखने पर ही लगता है। इसीलिए देश-दुनिया से बडी संख्या में बौद्ध मतावलंबी, पर्यटक, शोधार्थी, अध्येता इस बेमिसाल संरचना को देखने चले आते हैं। सांची के स्तूपों का निर्माण कई कालखंडों में हुआ जिसे ईसा पूर्व तीसरी सदी से बारहवीं सदी के मध्य में माना गया है। ईसा पूर्व 483 में जब गौतम बुद्ध ने देह त्याग किया तो उनके शरीर के अवशेषों पर अधिकार के लिए उनके अनुयायी राजा आपस में लडने-झगडने लगे। अंत में एक बौद्ध संत ने समझा-बुझाकर उनके शरीर के अवशेषों के हिस्सों को उनमें वितरित कर समाधान किया। इन्हें लेकर आरंभ में आठ स्तूपों का निर्माण हुआ और इस प्रकार गौतम बुद्ध के निर्वाण के बाद बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार इन स्तूपों को प्रतीक मानकर होने लगा।
सांची की स्थापना
बौद्धधर्म व उसकी शिक्षा के प्रचार-प्रसार में मौर्यकाल के महान राजा अशोक का सबसे बडा योगदान रहा। बुद्ध का संदेश दुनिया तक पहुंचाने के लिए उन्होंने एक सुनियोजित योजना के तहत कार्य आरंभ किया। सर्वप्रथम उन्होंने बौद्ध धर्म को राजकीय प्रश्रय दिया। उन्होंने पुराने स्तूपों को खुदवा कर उनसे मिले अवशेषों के 84 हजार भाग कर अपने राज्य सहित निकटवर्ती देशों में भेजकर बडी संख्या में स्तूपों का निर्माण करवाया। इन स्तूपों को स्थायी संरचनाओं में बदला ताकि ये लंबे समय तक बने रह सकें।
सम्राट अशोक ने भारत में जिन स्थानों पर बौद्ध स्मारकों का निर्माण कराया उनमें सांची भी एक था जिसे प्राचीन नाम कंकेनवा, ककान्या आदि से जाना जाता है। तब यह बौद्ध शिक्षा के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हो चुका था। ह्वेन सांग के यात्रा वृत्तांत में बुद्ध के बोध गया से सांची जाने का उल्लेख नहीं मिलता है। संभव है सांची की उज्जयनी से निकटता और पूर्व से पश्चिम व उत्तर से दक्षिण जाने वाले यात्रा मार्ग पर होना भी इसकी स्थापना की वजहों में से रहा हो। सम्राट अशोक की महारानी चन्द्र विदिशा के एक व्यापारी की पुत्री थीं जहां से सांची की पत्थर युक्त पहाडी दिखाई देती थी। सांची का उस दौर में कितना महत्व रहा होगा इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अशोक के पुत्र महेंद्र व पुत्री संघमित्रा श्रीलंका में धर्म प्रचार पर जाने से पूर्व यहां मठ में रहते थे जहां पर उनकी माता का भी एक कक्ष था।
हर धर्म की भांति बौद्ध कालीन संरचनाओं को उनकी मान्यताओं के अनुसार बनाया गया। बौद्धधर्म में ईश्वरवादी सिद्धांत के स्थान पर शिक्षाओं का महत्व है। इन संरचनाओं में मंदिर से परे स्तूप एक नया विचार था। स्तूप संस्कृत व पाली से निकला माना जाता है जिसका अर्थ होता है ढेर। आरंभ में केंद्रीय भाग में तथागत [महात्मा बुद्ध] के अवशेष रख उसके ऊपर मिट्टी पत्थर डालकर इनको गोलाकार आकार दिया गया। इनमें बाहर से ईटों व पत्थरों की ऐसी चिनाई की गई ताकि खुले में इन स्तूपों पर मौसम का कोई प्रभाव न हो सके। स्तूपों में मंदिर की भांति कोई गर्भ गृह नहीं होता। अशोक द्वारा सांची में बनाया गया स्तूप इससे पहले के स्तूपों से विशिष्ट था।
बौद्ध कला की सर्वोत्तम कृतियां
सांची में बौद्ध वास्तु शिल्प की बेहतरीन कृतियां हैं जिनमें स्तूप, तोरण, स्तंभ शामिल हैं। इनमें स्तूप संख्या 1 सम्राट अशोक द्वारा बनवाया गया था जिसमें महात्मा बुद्ध के अवशेष रखे गए। करीब में यहां पर दो अन्य छोटे स्तूप भी हैं जिनमें उनके दो शुरुआती शिष्यों के अवशेष रखे गए हैं। पहले स्तूप की वेदिका में जाने के लिए चारों दिशाओं में तोरण द्वार बन हैं। पूरे स्तूप के बाहर जहां पहले कठोर लकडी हुआ करती थी आज पत्थरों की रेलिंग है। अंदर वेदिका है व कुछ ऊंचाई तक जाने के लिए प्रदक्षिणा पथ है। स्तूप के गुंबद पर पत्थरों की वर्गाकार रेलिंग [हर्मिका] बनी है व शिखर पर त्रिस्तरीय छत्र है।
स्तूप की वेदिका में प्रवेश के लिए चार दिशाओं में चार तोरण [द्वार] हैं। पत्थर से बने तोरणों में महात्मा बुद्ध के जीवन की झांकी व जातक प्रसंगों को उकेरा गया हैं। यह कार्य इतनी बारीकी से किया गया है के मानो कारीगरों ने कलम कूंची से उनको गढा हो। इस स्तूप के दक्षिणी तोरण के सामने अशोक स्तंभ स्थापित है। इसका पत्थर आस-पास कहीं नहीं मिलता है। माना जाता है कि 50 टन वजनी इस स्तंभ को सैकडों कोस दूर चुनार से यहां लाकर स्थापित किया गया। यहां पर एक मंदिर के अवशेष है जिसे गुप्तकाल में निर्मित माना गया है। सांची के स्तूपों के समीप एक बौद्ध मठ के अवशेष हैं जहां बौद्ध भिक्षुओं के आवास थे। यही पर पत्थर का वह विशाल कटोरा है जिससे भिक्षुओं में अन्न बांटा जाता था। यहां पर मौर्य, शुंग, कुषाण, सातवाहन व गुप्तकालीन अवशेषों सहित छोटी-बडी कुल चार दर्जन संरचनाएं हैं।
शुंग काल में सांची में अशोक द्वारा निर्मित स्तूप को विस्तार दिया गया जिससे इसका व्यास 70 फीट से बढकर 120 फीट व ऊंचाई 54 फीट हो गई। इसके अलावा यहां पर अन्य स्तूपों का निर्माण कराया। सांची में इन स्तूपों का जीर्णोद्धार लंबे समय तक चला जिसमें इसे अद्वितीय बनाने के लिए कल्पना शक्ति का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद शुंग व कुषाण नरेशों ने अपने काल में यहां पर अन्य स्तूप निर्मित करवाए।
मौर्य, शुंग, कुषाण सातवाहन व गुप्तकाल तक बौद्ध धर्म फलता फूलता रहा किन्तु इनके पतन के उपरांत राजकीय कृपादृष्टि समाप्त होने से बौद्ध धर्म का अवसान होने लगा। लेकिन बाद के शासकों ने बौद्ध स्मारकों व मंदिरों को यथावत रहने दिया। सांची की कीर्ति राजपूत काल तक बनी रही किंतु पहले तुकरें के आक्रमण और बाद में मुगलों की सत्ता की स्थापना के बाद यह घटने लगी। औरंगजेब के काल में बौद्ध धर्म का केंद्र सांची गुमनामी में खो गया। उसके बाद यहां चारों ओर घनी झाडियां व पेड उग आए।
19वीं सदी में कर्नल टेलर यहां आए तोउन्हें सांची के स्तूप बुरी हालत में मिले। उन्होंने उनको खुदवाया और व्यवस्थित किया। कुछ इतिहासकार मानते हैं उन्होंने इसके अंदर धन संपदा के अंदेशे में खुदाई की जिससे इसकी संरचना को काफी नुकसान हुआ। बाद में पुराविद मार्शल ने इनका जीणरेंद्घार करवाया। चारों ओर घनी झाडियों के मध्य सांची के सारे निर्माण का पता लगाना और उनका जीणरेंद्वार कराके मूल आकार देना बेहद कठिन था, किंतु उन्होंने बखूबी से इसकी पुरानी कीर्ति को कुछ हद तक लौटाने में मदद की।
धर्म व पर्यटन का संगम
1989 में यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल होने के बाद से सांची का महत्व बहुत बढा। बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र होने के कारण यहां पर देशी व विदेशी मतावलंबियों का जमावडा लगा रहता है। सांची की भव्यता को देखने को प्रतिदिन हजारों पर्यटक पहुंचते हैं जिनमें विदेशी सैलानियों की बडी संख्या होती है। इस सारे परिसर के प्रबंधन व संरक्षण का कार्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन है। यहां का पुरातत्व संग्रहालय भी दर्शनीय है। आरंभ में वर्ष 1919 में इसे स्तूपों के निकट बनाया गया था किंतु जैसे-जैसे सामग्री की प्रचुरता होने लगी इसे 1986 में सांची की पहाडी के आधार पर नए संग्रहालय भवन में स्थानांतरित कर दिया गया। इस संग्रहालय में मौर्य, शुंग, सातवाहन, कुषाण, गुप्त कालीन प्रस्तर कला के अवशेष, मूर्तियां, शिलालेख आदि देखने को मिलते हैं। सांची के इन स्मारकों की भव्यता तो आगन्तुकों को चमत्कृत करती ही है, साथ में यहां का शांत वातावरण हर आने वाले को महात्मा बुद्ध के शांति के संदेश को समझाने में मदद देता है।

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