मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

जयपुर में लोकरंग का राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला पिछड़ा

फर्नीचर से दबी स्टालें  

प्रशासनिक अव्यवस्था का आलम तारी
पहली बार वसूला गया शिल्पियों से शुल्क
कई स्टॉल रहे खाली, शिल्पी लौटे हताश
स्टालों पर स्थानीय दुकानदारों का कब्जा
कपड़ा बाजार बना राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला
असल शिल्पियों कि लिए घाटे का सौदा
मूमल नेटवर्क, जयपुर। जवाहर कला केन्द्र के वार्षिक समारोह के रूप में मनाया जाने वाले लोकरंग के राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले के रंग इस बार फीके रहे। हर साल देश भर के हस्तशिल्प से सजने वाला यह मेला शिल्प की बजाय कपड़ा व्यापारियों से आबाद कपड़ा बाजार बनकर रह गया। मेले में लगी कुल 150 स्टॉल में से लगभग 75 स्टॉल पर केवल कपड़ा बेचा जा रहा है। कई स्टॉल धारकों ने ईमानदारी से स्वीकार किया कि वो शिल्पी नहीं व्यापारी हैं और उन्होंने व्यापार के लिए ही स्टॉल का किराया चुकाया है।
स्टॉल के पैसों की खरीदारों से वसूली
पिछली 9 अक्टूबर को शिल्पग्राम में शुरू हुए मेले का मंगलवार को पांचवां दिन था और कमोबेश हर स्टॉल पर बिक्री ठंड़ी होने होने की चर्चा थी।
प्रशासनिक कमियों के चलते इस वर्ष लोकरंग के हस्तशिल्प मेले को भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय से आर्थिक अनुदान की राशि नहीं मिल पाई। जवाहर कला केन्द्र द्वारा शिल्पियों से स्टॉल का किराया लेने के कारण कई वास्तविक हस्तशिल्पियों ने मेले से मूंह मोड़ा। मेले से शिल्पियों की विमुखता को देखते हुए जेकेके प्रशासन द्वारा स्थानीय व दिल्लाी के व्यापारियों को पांच-पांच हजार रुपए में स्टॉल का आवंटन किया। ऐसे में मेले में बिकने वाले उत्पादों के दाम 20 फीसदी तक बड़ा कर बोले गए। नतीजतन खरीदार की मेले के प्रति वह रुचि नहीं रही जो पिछले सालों तक देखी जा रही थी। 
कई वापस लौटे, कुछ मजबूरी में रुके
प्रशासनिक अव्यवस्था का आलम यह रहा कि देश के दूर-दराज के इलाकों से आए अधिकतर शिल्पी केवल इस कारण वापिस लौट गए कि उन्हें यह सूचना ही नहीं भेजी गई थी कि इस वर्ष स्टॉल के आवंटन सशुल्क होंगे। मेले में उपस्थित फर्नीचर व टेराकोटा शिल्पी भी इस मजबूरी के चलते शामिल हुए हैं कि जानकारी के अभाव में वो खासा माल भाड़ा देकर भारी सामान अपने साथ लाए थे।
प्रशासनिक अव्यवस्था का आलम 
मूमल के पूर्व के अंक में जेकेके सूत्रों के हवाले से यह समाचार प्रकाशित किया गया था कि केन्द्र ने पत्र द्वारा शिल्पियों को इस बार स्टॉल का आवंटन सशुल्क हो सकने की सूचना दी है। इधर कुछ एक उपस्थित शिल्पियों से बातचीत में यह सामने आया कि ऐसी कोई सूचना नहीं भेजी गई थी। शुल्क की जानकारी  शिल्पियों को मेले में आने के बाद ही प्राप्त हो पाई। केवल उन्हीं शिल्पियों को मेले में आने से पहले शुल्क की जानकारी थी जिन्होंने स्वयं केन्द्र से सम्पर्क कर जानकारी ली थी।
हस्तशिल्प के खरीदार हुए निराश
स्टॉल की कीमत निकालने के कारण मेले में सामान का मूल्य अधिक लगाया जा रहा है, जो खरीदारों को लुभा नहीं पा रहा। लकड़ी के फर्नीचर व कुछ टेराकोटा को इतना फैलाकर सजाया गया है कि उनके पीछे के स्टॉल दब कर रह गए हैं। दर्शक उस फैले हुए फर्नीचर को पार करके पीछे के स्टॉल तक पहंचने की परेशानी के चलते स्टॉलों को दूर से देखते हुए ही गुजर रहे हैं। इससे स्टॉलधारी काफी निराश हैं। इस परेशानी और ठंडी दुकानदारी के चलते कई स्थानीय स्टॉलधारी तो शाम 4 बजे तक स्टॉल्स ही नहीं खोल रहे।
नहीं दिखे अनेक शिल्प
बंगाल का सोला, सिप्पियों व बांस से सजा शिल्प, बंगाल का कांथा वर्क, उड़ीसा का शिल्प, दक्षिण के लैम्प शैड, मुखौटे व सजावटी सामान, दक्षिण का ही लकड़ी शिल्प, आसाम व गोवा का शिल्प, जोधपुर की जूतियां, जयपुर की कठपुतलियां व अन्य सजावटी सामान, भीलवाड़ा की फड़ चित्रकारी, उड़ीसा की पट चित्रकारी, विभिन्न स्थानों से आने वाली पेपरमेशी शिल्प व पेंटिंग्स इत्यिादि।





गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014

जयपुर में लोकरंग के तहत राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले की तैयारियां

पहला दिन खाली खाली सा 
इस बार महंगे हो सकते है शिल्प मेले के हैंडीक्राफ्ट आइटम
शिल्पियों से स्टॉल का शुल्क पांच हजार लेंगे
हस्तशिल्प विभाग से सहयोग राशि मिलने के आसार नहीं
मूमल नेटवर्क, जयपुर। शहर में प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी दीपावली पूर्व के शिल्प मेलों की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में बसे शिल्पी अपनी कला का हुनर दिखाने के लिए अन्तिम तैयारियों में जुटे हैं। दूसरी ओर इस साल जयपुर के जवाहर कला केंद्र में आयोजित होने वाले लोकरंग के शिल्प मेले के लिए केन्द्र सरकार से सहयोग राशि मिलने के आसार बहुत कम नजर आ रहे हैं। इसका सीधा असर मेले में बिकने वाले उत्पादों के मूल्य पर नजर आ सकता है।
तैयारियां जोरों पर
हर वर्ष दीपावली से पहले दो शिल्प मेलों की तैयारी बड़े पैमाने पर की जाती है। आमेर रोड स्थित परशुरामद्वारा का हस्तशिल्प मेला और जवाहर कला केन्द्र के वार्षिक उत्सव लोकरंग के तहत लगने वाला राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला। दोनों मेले अपनी तैयारियों के चरम पर हैं। जयपुरवासी बड़े उत्साह के साथ हस्तशिल्प के नए अन्दाज देखने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यृूं तो हमेशा हस्तशिल्प को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा हस्तशिल्पियों को नि:शुल्क स्टॉल्स का आवंटन किया जाता है, लेकिन इस बार संभवत: व्यवस्था में परिवर्तन होने की आशंका है।
शिल्पियों से वसूलेंगे शुल्क
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रशासनिक कारणों के चलते इस वर्ष जवाहर कला केन्द्र को वस्त्र मंत्रालय के हस्तशिल्प विभाग से प्राप्त आर्थिक सहयोग संभवत नहीं मिल पाएगा। केन्द्र ने मेले के लिए हस्तशिल्पियों को आमन्त्रित किए गए पत्र में इस बात का उल्लेख किया है। केन्द्र ने हस्तशिल्पियों को यह सूचना दी है कि यदि भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय द्वारा आर्थिकसहयोग की राशि प्राप्त नहीं हो पाती है तो उन्हें स्टॉल के लिए शुल्क का भुगतान करना पड़ेगा। शुल्क की राशि प्रतिदिन 500 रुपए तक हो सकती है। इस पत्र को पाने के बाद शिल्पी असमंजस में है।
महंगेे हो सकते हैं उत्पाद
जाहिर बात है कि यदि शिल्पियों को केन्द्र से स:शुल्क स्टॉल का आवंटन होता है तो इसका सीधा असर मेले में बिकने वाले हस्तशिल्प उत्पादों पर ही पड़ेगा। इस नई व्यवस्था के साथ ही वार्षिक हस्तशिल्प मेलों में शिल्पियों से शुल्क लेने की नई परम्परा शुरू हो सकती है। इस संभावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि जवाहर कला केन्द्र यदि इस प्रयोग में सफल होता है और शिल्पी शुल्क देने के साथ मेले में हिस्सा लेने को सहमत होते हैं तो रूडा द्वारा आयोजित मेलों में भी शिल्पियों से शुल्क वसूला जा सकता है।
रूडा को भी नही मिला सहयोग
उल्लेखनीय है कि बीते अगस्त में रूडा द्वारा जेकेके के शिल्पग्राम में आयोजित मेले के लिए भी भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय द्वारा सहयोग राशि प्राप्त नहीं हो पाई थी। रूडा द्वारा डीसीएच को भेजे गए प्रस्ताव की स्वीकृति ही मेला बीत जाने के बाद प्राप्त हुई।
अधिकारी का कहना है ज्यादा असर नहीं पड़ेगा
जवाहर कला केन्द्र के जन सम्पर्क अधिकारी का कहना है कि लोकरंग के राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले के लिए वस्त्र मंत्रालय के हस्तशिल्प विभाग से सहयोग राशि के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। अगर वह प्राप्त नहीं हुई तो हस्तशिल्पियों से स्टॉल के लिए शुल्क वसूलने का प्रस्ताव है। इससे उत्पादों की कीमत बढ़ सकती है, लेकिन इससे कोई ज्यादा असर नहीं पड़ेगा।

कपड़े वालों की दुकाने सजी 

कपड़े वालों की दुकाने सजी 

पॉश फर्नीचर 



रविवार, 11 मई 2014

जयपुर के जेकेके में सजेंगे पुडुकोट्टई के अश्व

पूरी तरह तैयार होने के बाद कुछ ऐसे होंगे पुडुकोट्टई के अश्व
माटी सृजन शिविर
मूमल नेटवर्क, जयपुर। यहां के जवाहर कला केंद्र के परिसर में बहुत जल्द ही पुडुकोट्टई के टेराकोटा अश्व सजेंगे।
घोड़ों के मूल आकार की यह रचनाएं यहां चल रहे माटी सृजन शिविर में तैयार की जा रही हैं। पन्द्रह दिवसीय यह शिविर 7 मई को शुरू आ है जो 21 मई तक चलेगा। शिविर में राजस्थान के दो और तमिलनाडु के एक कलाकार की टीम टेराकोटा कृतियों का सृजन कर रही हैें।
तमिलनाडु के पुडुकोट्टई गांव में बनने वाले घोड़े यहां पहली बार देखने को मिलेंगे। राजस्थान के रामगढ़ (अलवर) और मोलेला (राजसमंद) के कलाकार भी शिविर में पूरे मनोयोग से लगे हैं लेकिन स्थानीय कला प्रेमियों के देखने को अब तक तो कुछ नया नहीं है, हो सकता है शिविर के पूरा होने तक प्रदेश के ये शिल्पी कुछ नया सृजन कर दें?
मोलेला की मिट्टी से खेलते-खेलते उसे विभिन्न आकार देते हुए बहुत कुछ कहने वाले कलाकार जमना लाल कुम्हार यहां देव संग्रह की रचना कर रहे हैं। अपने युवा सहायक  प्रशंान्त के साथ उनहोंने लगभग 5 गुणा 3 फीट का एक फलक तैयार किया है। मिट्टी के लिए बिना किसी सपोर्ट के बनाए गए इस फलक पर विभिन्न लोक देवी-देवताओं की आकृतियां उभरनी शुरू हुई हैं। मौसम के हालात सामान्य रहे तो यह रचना अगलेे 10-12 दिनों में तैयार हो जाएगी।
देव संग्रह की रचना करते मोलेला के जमनालाल कुम्हार
पूरी तरह तैयार होने के बाद कुछ ऐसा होगा देव संग्रह
 अलवर के रामगढ़ गांव से आए ओम प्रकाश गालव अपने साथियों के साथ मिलकर मिट्टी के बड़े-बढ़े पात्र बनाने में जुटे हैं। सन् 2010 में इसी विधा में नेशनल अवार्ड प्राप्त करने वाले ओम प्रकाश हस्तशिल्प के लिए युनेस्को एक्सेलन्स अवार्ड से भी संम्मानित हो चुके हैं।
मिट्टी के पात्र तैयार करते
 राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त
शिल्पी ओम प्रकाश
तमिलनाडु के पुड़कोट्टई गांव से आए शिल्पी आर. मेयर और उनके साथी बड़े  आकार के दो घोड़े बना रहे हैं। यह घोड़ेे वहां के लोक देवता अय्यानर के चढ़ावे के रूप में प्रति वर्ष हजारों की संख्या में तैयार किए जाते हैं। स्थानीय लोग अपनी मान्यता पूरी होने पर यह घोड़े अय्यानर को अर्पित करते हैं।
माटी सृजन शिविर में बन रहे पुडुकोट्टई के अश्व
शिविर के संयोजक किशोर सिंह के अनुसार माटी के इन शिल्पों को तैयार करने के बाद परम्परागत तरीके से आंच में तपाया जाएगा। इसके लिए मौसम का अनुकूल होना जरूरी होता है। वैसे भी टेराकोटा शिल्प के लिए बहुत अधिक गर्मी या बहुत अधिक सर्दी अनकूल नहीं होती और वर्षा ऋतु तो खैर पूरी तरह प्रतिकूल होती है। सर्दी में जहां मृण्कला बहुत देर से सूखती है, गर्मी में यह बहुत जल्दी सूख कर तडक जाती है। अभी चल रहे शिविर में भी शिल्पी अपनी रचनाओं को सूती कपड़े से ढांप कर गर्म हवाओं से बचा रहे हैं।
-प्रस्तुति: राहुल सेन 


मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

बुधवार, 13 नवंबर 2013

काश! कला जगत में 'मैं' की जगह 'हम' हो


 मूमल संपादकीय
चहुमुखी सराहना तो कुछ आलोचना भी

जयपुर का पहला आर्ट समिट सम्पन्न हो गया। ...और जैसा कि अक्सर होता रहा है, इसके आयोजन के प्रति भी विरोधी स्वर मुखर हुए। समिट की समाप्ती से पहले ही जयपुर के कलाकारों की गुटबाजी के नतीजे सामने आने लगे। मुद्दा वही अहम् का रहा। इस प्रकार एक बेहतर पहल को सराहना के साथ-साथ आलोचना भी मिली।
 माहौल बोझिल हुआ है और संवेदनाए चोटिल
 कला जो कभी सत्यम शिवम सुन्दरम् और सुखाय का दूसरा नाम हुआ करती थी अब उसके पैमाने बदल गए हैं। कलाकारों क बीच की गुटबाजी, राजनीतिक दलों की खेमेबाजी का अहसास कराने लगी है। इसके चलते कला जगत का माहौल बोझिल हुआ है और संवेदनाए चोटिल। ऐसे में आपस में ही लड़ते-भिड़ते कलाकार क्योंकर आम आदमी को कला की ओर आकर्षित कर अपनी कला से उन्हें जोड़ पाएगें। यही कारण है कि कुछ कलाकार तो अब साफ ही कहने लगे हैं कि उनकी खास कला आम आदमी के लिए है ही नहीं।
इस गुटबाजी और एक-दूसरे पर लगाए जा रहे आरोप-प्रत्यारोप को प्रतिस्पर्था का क्रत्रिम चोला नहीं पहनाया जा सकता। स्वस्थ्य प्रतियोगिता तो एक अलग ही शै होती है जो कला को और निखारने का काम करती है। प्रतिस्पर्धियों को  और बेहतर कृतियों का कर्ता बनने को प्रेरित करती है। उसके इरादों को और मजबूत बनाती हैं। आम आदमी से सहजता पूर्वक जोड़ती है। जबकि गुटबाजी कलाकार के संवेदशील मन में विकार और द्वन्द के जाल में उलझा देती है। इसका सीधा असर उसकी कृतियों में देखने को मिल जाता है। साधना से साध्य के बजाय साधन और भोतिकता की ओर बढ़ते कला के कदम इसी का परिणाम है।
मैं के कठघरे में कैद 
हम यह नहीं कह रहे कि निर्मित कलाकृतियां सुंदर नहीं, लेकिन स्वस्थ्य प्रतिस्पर्धा के अभाव में वे कांतिहीन हैं, प्राणहीन भी कह सकते हैं। कला संसार सहजता, सरलता, सद्भाव और संवेदनाओं से सजता है। इसे मैं की जगह हम का भाव प्रभावी बना सकता है। यहां इस बात का अफसोस है कि कलाकार मैं के कठघरे में स्वयं को कैद करता जा रहा है।
 उधेड़ सकते हैं तो बुन भी सकते हैं।
यह सही है कि किसी भी आयोजन में बहुत कुछ अच्छा किए जाने के बाद भी कुछ कमियां रह जाती है। किसी आयोजन में ये कमियां कुछ होती हैं और किसी में बहुत कुछ छूट जाता है। इन कमियों को बेहतर सलाह, सहृदयता, सहनशीलता और साथ के बल पर दूर किया जा सकता है। जब जब एक खेमा अपने आयोजन में दूसरे खेमें की कला को स्थान नहीं दे पाता है तो दूसरे खेमें के आयोजन में पहले खेमे की कला को स्थान नहीं मिलने की विवशताएं उसी प्रकार की होती है जैसी पहले आयोजन के लिए थी। इसी प्रकार किसी फैस्टिवल या समिट के आयोजन में भी कई बाते अलग हो सकती हैं, ऐमें उनकी तुलना बेमानी हो जाती है। कुल मिलाकर हम चाएं तो कमियों की फटी चादर में अपनी मैं की टांग फंसा कर उसे और अधिक उधेड़ सकते हैं और चाहें तो हम के ताने-बाने से उसे बुन भी सकते हैं।

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

लोकरंग-2013, राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला

(19 से 29 अक्टूबर, 2013)
लोक कलाकारो और हस्त शिल्पियों के राष्ट्रीय उत्सव का शुभारंभ कल से
राज्यपाल श्रीमती माग्रेट आल्वा करेंगी उद्घाटन

Moomal Network, जयपुर। राज्यपाल, राजस्थान महामहिम श्रीमती माग्रेट आल्वा कल शनिवार 19 अक्टूबर, 2013 को सायं 6.30 बजे जवाहर कला केन्द्र, जयपुर द्वारा आयोजित राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला-गांधी शिल्प बाजार एवं राष्ट्रीय लोकनृत्य समारोह लोकरंग-2013 का विधिवत् उद्घाटन कर शुभारंभ करेंगी।

यह जानकारी देते हुए श्रीमती राजेश यादव, महानिदेशक जवाहर कला केन्द्र ने बताया की शिल्पग्राम में लगे राष्ट्रीय हस्त शिल्प मेंले-गांधी शिल्प बाजार में देश के विभिन्न प्रदेशो के हस्तशिल्प कलाकार 150 से भी अधिक स्टॉल में अपनी हस्तशिल्प कला को प्रदर्शित कर रहे है।
विभिन्न प्रदेशो से आये इन शिल्पियों में कई राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय पुरस्कार प्राप्त शिल्पियों के साथ कुछ नये कलाकार भी सम्मिलित हो रहे है। विकास आयुक्त (हस्तशिल्प), वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से आयोजित यह मेला शिल्प कला के खरीददारो को भी प्रोत्साहित करता है। मेले में राजस्थान सहित 21 राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों के हस्तशिल्पियों की स्टॉल में वुड वर्किंग, एम्ब्रोडरी, टेक्सटाईल, लाख की चूडिय़ां, केन बेम्बू, हेण्डलूम, जूट, पेच वर्क, ब्लू पोटरी, टेराकोटा, पेपरमेशी, लेदर वर्क, जूट क्राफ्ट, लकड़ी के खिलौने, ड्राई फ्लावर, पेंटिग, बंधेज, कशीदाकरी आदि शिल्प कला के उत्कृष्ठ नमूने प्रदर्शित किये जा रहे है।
मेला प्रति दिवस मध्यांह 2.00 बजे से रात्रि 10.00 बजे तक दर्शकों के लिए खुला रहेगा। मेले के दौरान फूड जोन में अपने मन पसंद व अन्य जायकेदार व्यंजनों का दर्शक लुत्फ उठा सकेंगे।
त्यौहारों को और अधिक जीवंत बनाने के लिए लोक कलाकार अपनी संगीत और नृत्य की छठा प्रति दिवस शिल्पग्राम के डूंगरपुर हट के मंच पर
बिखेरेंगे। इसी क्रम में प्रथम दिवस 19 अक्टूबर को डूंगरपुर हट मंच पर छत्तीसगढ़ के लोक कलाकार अपनी नृत्यों की प्रस्तुति देंगे, वहीं बहुरूपिया, कच्ची घोड़ी आदि के कलाकर भी अपनी कला से दर्शको को रू-ब-रू करवायेंगे। मेले मेे प्रवेश नि:शुल्क है।

राष्ट्रीय लोक नृत्य समारोह

11 दिवसीय इस 20 वें लोकरंग के दौरान केन्द्र के मध्यवर्ती सभागार में प्रतिदिवस देश के कोने-कोने से विभिन्न प्रदेशो, केन्द्र शासित प्रदेशो के नृत्य दल, गायक समूह और लोक नाट्य अपनी परंपरा अपने संगीत और अपने प्रदेश की सांस्कृतिक छटा से दर्शको को सराबोर करेंगे। इसमें प्रतिभागी 22 राज्य यथा महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा, हिमाचल, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, जम्मू कश्मीर, झारखण्ड, कर्नाटक, असम, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, ओडिशा, आन्ध्र प्रदेश एवं राजस्थान के लगभग 1200 कलाकार भाग लेंगे।

लोकनृत्य समारोह के प्रथम दिन मध्यवर्ती में 19 अक्टूबर 2013 शनिवार सायं 7.00 बजे महाराष्ट्र, गुजरात, छत्तीसगढ़, ओडिशा, असम, मणिपुर, झारखण्ड, एवं राजस्थान के लगभग 150 कलाकार अपनी कला की प्रस्तुति देंगे। इसी क्रम में महाराष्ट्र के कलाकार-लांवणी, गुजरात-सिद्धिगोमा,
छत्तीसगढ़-पंथी, ओडिशा-गोटीपुआ, असम-बिंहु, मणिपुर-मणिपुर रास, झारखण्ड-करसा, संथाल, मानभूम छाऊ, राजस्थान - चरी नृत्य की प्रस्तुति
देंगे।

विशेष सामग्री

उन्नीस वर्षो के सफल आयोजन का इतिहास लिए राष्ट्रीय सांस्कृतिक समारोह 'लोकरंगÓ-2012 में अपनी शैशवास्था और तरूणाई से निकल अब पूर्ण वयस्क हो गया है। इस वर्ष भी देश के कोने - कोने से विभिन्न प्रदेशो, केन्द्र शासित प्रदेशो के नृत्य दल, गायक समूह और लोक नाट्य अपनी परम्परा, अपने संगीत और अपने प्रदेश की सांस्कृतिक छटा से सराबोर जवाहर कला केन्द्र में सम्मिलित होंगे।
भारतीय पंचांग के अनुसार कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर एकादशी अर्थात 19 से 29 अक्टूबर, 2013 तक चलने वाले इस समारोह में राजस्थान सहित देश के विभिन्न प्रान्तो के लोक एवं आदिवासी कलाकार अपने पारम्परिक वेश, अनूठे वाद्य यंत्रो और मद मस्त संगीत के साथ प्रति दिन दर्शको के समक्ष समृद्ध भारतीय संस्कृति की प्रस्तुति देंगे। समारोह का समापन सब राज्यो की सम्मिलित प्रस्तुति के रूप में 'ग्रान्ड फिनालेÓ निश्चय ही सुधी दर्शको को जोड़े रखने में सफल होगा।
गत 'लोकरंगÓ समारोह में उमड़े जन समूह को दृष्टिगत रख मुक्ताकाशी सभागार के बाहर परिसर में स्क्रीन पर कार्यक्रमों के जीवंत प्रसारण की भी व्यवस्था की गई है।
तीन दिवसीय समारोह से प्रारम्भ होकर यह लोकरंग अब ग्यारह दिनों तक मनाया जाता है किन्तु हर दिन दर्शकों का सैलाब आनन्द की लहरो में डूब जाता है। अपने 20वें सोपान पर लोकरंग अपनी गरिमा पूर्ण परम्परा के अनुरूप अनेकता में एकता की हमारी संस्कृति के विभिन्न पहलुओं के साथ
आपको सादर समर्पित है। आइए हर्ष, उल्लास और आनन्द के इस पर्व में आप भी सम्मिलित हो सकतेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेे हैं।

राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला
(दोपहर 2 से रात्रि 10 बजे तक)
केन्द्र परिसर के शिल्पग्राम में आयोजित यह बहुरंगी मेला देश की प्रति-निधि हस्तकलाओं की वृहद प्रदर्शनी प्रस्तुत करता है। ग्रामीण राजस्थान की झलक प्रस्तुत करते शिल्पग्राम में प्रदेश के ग्रामीण वास्तु पर आधारित छ: घर बने हुए है। बृज (भरतपुर) के घर में खपरेल की छाजन है तो हाडौती (पलायता) में केलू की; दक्षिणी राजस्थान के भील ऊंचे टीलो पर घर बनाते है, उसी परम्परा में बना है, डूंगरपुर का भील डूंगरपुर आवास; बाड़मेर के गोल झौपे निर्माण में सेवण घास की छप्पर और आक की लकड़ी लगी है; बीकानेर और सीकर के निवास भी अपने-अपने क्षेत्र में उपलब्ध निर्माण सामग्री से बने है; बीच का बाजार (हॉट) जयपुर का है इन मकानों में बने मांडणे भी संबंधित क्षेत्रों से ही लिए गये है। यहां देखा जा सकता है समग्र राजस्थान।
भारतीय हस्तशिल्पियों और उनके हस्त कौशल का संगम 'लोकरंगÓ के अवसर पर शिल्पग्राम में देखने को मिलता है। सभी प्रदेशों के शिल्पी अपनी श्रेष्ठ कृतियों के साथ यहां आते है। इनमें राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय पुरस्कार प्राप्त शिल्पी तो होते ही है, कुछ नए कलाकारों को भी अवसर दिया जाता है ताकि नई पीढ़ी भी तैयार हो। विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार के सक्रिय आर्थिक सहयोग से आयोजित यह मेला शिल्पकला के खरीददारों को भी प्रोत्साहित करता है। मेले में लगभग 150 स्टॉल में देश के विभिन्न देशों के हस्तशिल्प कलाकार अपनी हस्तकला को प्रदर्शित करेंगे।
जयपुर, जोधपुर का बंधेज, कच्छ की कशीदाकारी, मोलेला - पोकरण की मृदाकला, बस्तर का लोह शिल्प, बंगाल का चर्म शिल्प, दक्षिण भारत की वस्त्र बुनाई, लाख, नमदा, काष्ठ शिल्प, मोजड़ी कोल्हापुरी चप्पल, चिकनकारी, पैच वर्क, बांस-बैत का काम, यानि लोगों का मन मोह लेने वाले हर प्रकार के शिल्प प्रदर्शन और बिक्री के लिए यहां उपलब्ध रहेगा।
त्यौहारों को और अधिक जीवंत बनाने के लिए लोक कलाकार अपने संगीत और नृत्य की छटा प्रति दिवस शिल्पग्राम के डूंगरपुर हट के मंच पर बिखेरेंगे। वही नट, बहुरूपिया, अलगोजा, कठपुतली कलाकार भी अपनी कला से दर्शकों को रू-ब-रू करवायेंगे।

प्रतिभागी राज्य हैं
अरूणाचल प्रदेश, असम, आन्ध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, गोवा, लक्षद्वीप, ओड़ीसा, कर्नाटक, केरल, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, झारखण्ड, पंजाब, पश्चिम बंगाल, मणिपुर, महाराष्ट्र, हरियाणा एवं राजस्थान।

राष्ट्रीय लोक नृत्य समारोह मध्यवर्ती में
सायं 7 बजे से
प्रायोजक हैं:
पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, उदयपुर
उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, इलाहाबाद
उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, पटियाला
दक्षिणी क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, तेजावुर
तमिलनाडू, गोवा, महाराष्ट्र, बिहार
हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखण्ड
मध्य प्रदेश, त्रिपुरा, ओडिसा, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, गुजरात, उत्तर प्रदेश व राजस्थान।

बुधवार, 7 नवंबर 2012

शिल्प के राष्ट्रीय पुरस्कार 9 को

मूमल नेटवर्क , नई दिल्ली। हस्तशिल्प के क्षेत्र में श्रेष्ठ चुनिंदा कृतियों के शिल्पकारों को राष्ट्रीय सम्मान व पुरस्कार प्रदान करने के लिए 9 नवम्बर को राजधानी दिल्ली में समारोह होगा।
अगर सब निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हुआ तो विज्ञान भवन में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी शिल्पियों को एक समारोह में सम्मानित करेंगे।
भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के आधीन कार्यरत हस्तशिल्प विकास आयुक्त द्वारा प्रति वर्ष देशभर से चुने गए 20 श्रेष्ठ शिल्प कार्यों के लिए यह सम्मान दिए जाते हैं। इनमें 10 राष्ट्रीय पुरस्कार और 10 राष्ट्रीय मेंरिट प्रमाण की  श्रेणी में होते हैं। पिछले वर्ष 2010 के लिए यह पुरस्कार प्रदान नही  किए जा सके थे। इसलिए इस वर्ष 2011 के पुरस्कारों के साथ वह भी प्रदान किए जाएंगे।

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

हस्तशिल्प उत्पादों को उम्मीद से बेहतर रेस्पांस

                                 बिक्री का आंकड़ा 2500 करोड़ के पार पहुंचने की उम्मीद
                                 नक्काशी एवं जड़ाऊ उत्पाद भी लिए जा रहे हाथों-हाथ

मूमल नेटवर्क, जयपुर। राजस्थान के हस्तशिल्प उत्पादों के दाम बढऩे के बावजूद दीपावली व क्रिसमस के त्यौहारी सीजन में विदेशी और घरेलू बाजार में इन उत्पादों की मांग काफी बढ़ी है। उत्पादों को उम्मीद से बेहतर रिस्पांस मिला है। इसका कारण शिल्प की नई डिजाइंस व अनूठी निर्माण शैली तो है ही, महंगाई के बावजूद नियंत्रित कीमतें भी आकर्षण का कारण हैं। ऐसे में गत वर्ष की तुलना में इस साल बिक्री में 300 करोड़ से अधिक का इजाफा हुआ है। बिक्री का आंकड़ा 2500 करोड़ के पार पहुंचने की उम्मीद है। नक्काशी एवं जड़ाऊ हस्तशिल्प को उत्पादों को बाजार में हाथों-हाथ लिया जा रहा है।
घरेलू मार्केट में भी पैठ
सस्ते व अनूठे उत्पादों की बदौलत विदेशी बाजार में दम भर रहा राजस्थान का हैंडीक्राफ्ट कारोबार अब घरेलू मार्केट में भी पैठ बना रहा है। विदेशी बाजार में वुडन, टैक्सटाइल, नक्काशी, ब्लू पॉटरी, मार्बल, टेराकोटा, ग्लास वेयर व लाख के हैंडीक्राफ्ट उत्पाद के साथ घरेलू सजावट व फर्नीचर से जुड़े उत्पाद डिजाइनदार बेड, सोफा सेट, कुर्सियां, मेज, वाल पेंटिंग, मैटल व लकड़ी पर बारीक चित्रकारी कर बनाई गई घडिय़ां, फूलदान, पेड़ की छाल से बने कलात्मक फूल और चांदी की बारीक जड़ाऊ शो पीस की मांग अधिक है।
घरेलू बाजार में भी सजावट के लिहाज से इन उत्पादों की मांग काफी बढ़ी है। फेडरेशन ऑफ  राजस्थान एक्सपोर्टर्स के अध्यक्ष राजीव अरोड़ा के अनुसार त्यौहारी सीजन में घरेलू सजावट से जुड़े हैंडीक्राफ्ट उत्पादों को उम्मीद से बेहतर रिस्पांस मिला है। नक्काशी एवं जड़ाऊ हैंडीक्राफ्ट उत्पादों को भी घरेलू बाजार में हाथों-हाथ लिया जा रहा है।
दाम 20 फीसदी से अधिक बढ़ा
हैंडीक्राफ्ट उद्यमी व सीआईआई जयपुर शाखा के अध्यक्ष दिलीप बैद ने बताया की हैंडीक्राफ्ट उत्पादों की मांग के पीछे इनकी डिजाइन व अनूठी निर्माण शैली तो है ही, कम कीमतें भी आकर्षण का कारण हैं। लेकिन पिछले कुछ अर्से से सरकारी रियायतों के बावजूद यह उद्योग बढ़े हुए लागत भार से त्रस्त है। हैंडीक्राफ्ट उत्पाद निर्माताओं व निर्यातकों ने इस सीजन में दाम 20 फीसदी से अधिक बढ़ा की बढ़ोतरी कर दी है। विदेशी बाजार से भी नए ऑर्डर बढ़ी कीमतों पर ही लिए जा रहे हैं। इसके बावजूद गत वर्ष की तुलना में इस साल बिक्री में 300 करोड़ से अधिक का इजाफा हुआ है।
बिक्री का आंकड़ा 2500 करोड़ के पार
निर्माताओं को बिक्री का आंकड़ा 2500 करोड़ के पार पहुंचने की उम्मीद है। इसमें से करीब 1500-1600 करोड़ रुपये का निर्यात हो रहा है। फैडरेशन ऑफ राजस्थान हैण्डीक्राफ्ट एक्सपोर्ट (फॉरहेक्स) के अध्यक्ष जसवंत मील का कहना है कि  पिछले कुछ अरसे में कच्चे माल कीमतों में जबरदस्त उछाल रहा है। ऐसे में अंतिम विकल्प कीमतों में बढ़ोतरी है। कीमतें बढऩे से मांग पर आंशिक असर पड़ सकता है। लेकिन जिस हिसाब से इन उत्पादों की लोकप्रियता बढ़ रही है, इसकी संभावना कम है।

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

अब वयस्क हो गया जेकेके का 'लोकरंग'

मूमल नेटवर्क जयपुर। जयपुर के जवाहर कला केंद्र की ओर से आयोजित वार्षिक 'लोकरंग' का शुभारंभ राज्यपाल मारग्रेट अल्वा ने किया। पिछले अठारह वर्षो के आयोजन का इतिहास लिए राष्ट्रीय सांस्कृतिक समारोह 'लोकरंग' अपनी शैशवास्था और तरूणाई से निकल
अब पूर्ण वयस्क हो गया है। इस वर्ष 2012 में भी देश के कोने-कोने से
विभिन्न प्रदेशो, केन्द्र शासित प्रदेशो के नृत्य दल, गायक समूह और
लोक नाट्य अपनी परम्परा, अपने संगीत और अपने प्रदेश की सांस्कृतिक
छटा से सराबोर लगभग 1200 कलाकार जवाहर कला केन्द्र में सम्मिलित
होंगे।
भारतीय पंचांग के अनुसार कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से प्रारम्भ
होकर एकादशी अर्थात 30 अक्टूबर से 09 नवम्बर, 2012 तक चलने वाले
इस समारोह में राजस्थान सहित देश के विभिन्न प्रान्तो के लोक एवं
आदिवासी कलाकार अपने पारम्परिक वेश, अनूठे वाद्य यंत्रो और मद मस्त
संगीत के साथ प्रति दिन दर्शको के समक्ष समृद्ध भारतीय संस्कृति की प्रस्तुति
देंगे। समारोह का समापन सब राज्यो की सम्मिलित प्रस्तुति के रूप में होगा।
गत 'लोकरंगÓ समारोह में उमड़े जन समूह को दृष्टिगत रख
मुक्ताकाशी सभागार के बाहर परिसर में स्क्रीन पर कार्यक्रमों के लाइव
प्रसारण की भी व्यवस्था की गई है।

तीन दिवसीय समारोह से प्रारम्भ होकर यह लोकरंग अब ग्यारह
दिनों तक मनाया जाता है
अपने 19वें सोपान पर लोकरंग अपनी गरिमा पूर्ण परम्परा के अनुरूप
अनेकता में एकता की हमारी संस्कृति के विभिन्न पहलुओं के साथ
दर्शको को समर्पित होगा।

राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला
केन्द्र परिसर के शिल्पग्राम में आयोजित यह बहुरंगी मेला देश की
प्रति-निधि हस्तकलाओं की वृहद प्रदर्शनी प्रस्तुत करता है।
भारतीय हस्तशिल्पियों और उनके हस्त कौशल का संगम
'लोकरंगÓ के अवसर पर शिल्पग्राम में देखने को मिलता है। सभी
प्रदेशों के शिल्पी अपनी श्रेष्ठ कृतियों के साथ यहां आते है।
इनमें राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय पुरस्कार प्राप्त शिल्पी तो होते ही है,
कुछ नए कलाकारों को भी अवसर दिया जाता है ताकि नई पीढ़ी भी
तैयार हो। विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार के
सक्रिय आर्थिक सहयोग से आयोजित यह मेला शिल्पकला के खरीददारों को
भी प्रोत्साहित करता है। मेले में लगभग 150 स्टॉल में देश
के विभिन्न देशों के हस्तशिल्प कलाकार अपनी हस्तकला को प्रदर्शित
करेंगे।

क्या -क्या मिलेगा
जयपुर, जोधपुर का बंधेज, कच्छ की कशीदाकारी, मोलेला -
पोकरण की मृदाकला, बस्तर का लोह शिल्प, बंगाल का चर्म शिल्प, दक्षिण
भारत की वस्त्र बुनाई, लाख, नमदा, काष्ठ शिल्प, मोजड़ी कोल्हापुरी,
चप्पल, चिकनकारी, पैच वर्क, बांस-बैत का काम, यानि लोगों का मन
मोह लेने वाले हर प्रकार के शिल्प प्रदर्शन और बिक्री के लिए यहां
उपलब्ध रहेगा।

प्रतिभागी राज्य
प्रतिभागी राज्य हैं अरूणाचल प्रदेश, असम, आन्ध्र प्रदेश,
उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड,गोवा, लक्षद्वीप, ओड़ीसा, कर्नाटक, केरल,
गुजरात, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर, झारखण्ड, पंजाब, पश्चिम बंगाल, मणिपुर,
महाराष्ट्र, हरियाणा एवं राजस्थान।

शनिवार, 29 सितंबर 2012

राष्ट्रीय पुरस्कार चयन में देरी के आसार,

दलाल अब भी सक्रीय

मूमल नेटवर्क, जयपुर। शिल्प के क्षेत्र में दिए जाने वाले राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए होने वाले शिल्पों के चयन में हो रही देरी के चलते इस साल भी यह पुरस्कार समय पर वितरित होने के आसार कम होते जा रहे है।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार प्रदेश स्तर पर चयनित होने वाली कृतियां चुनी जा चुकी हैं। द्वितीय चरण में मुख्यालय स्तर पर दिल्ली में 7 सितम्बर 2012 को प्रदेशों से चुन कर आई प्रविष्ठियों में श्रेष्ठ कृतियों का चयन होना था। समाचार लिखे जाने तक मुख्यालय स्तर पर इस पर कोई कार्यवाई नहीं हुई। इस देरी के चलते केन्द्रीय चयन समिति द्वारा श्रेष्ठतम शिल्पों के चयन के लिए होने वाली कार्रवाई में भी देरी के आसार हो गए हैं।
अंतिम चरण में केन्द्रीय स्तरीय चयन समिति द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए 20 व राष्ट्रीय प्रमाण पत्रों के लिए भी 20 श्रेष्ठ शिल्पकृतियों का चयन किया जाएगा। अगर कार्य की गति बढ़ाकर सब कार्य समय से हों तो यह समिति अपना कार्य 21 नवम्बर 2012 को पूरा करेगी।
हालांकि ऐसा कभी नहीं हुआ है, फिर भी अगर तय कार्यक्रम के अनुसार चयनित शिल्पकृतियों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार और वर्ष 2011 के लिए शिल्पगुरू सम्मान इसी वर्ष दिसम्बर के महीने में हस्तशिल्प सप्ताह के दौरान वितरित किए जाएंगे।
समितियों की संरचना
मुख्यालय स्तरीय समिति के सदस्य 
1. डीसी के अध्यक्ष
2. एडीसी संयोजक
3. एडीसी (हथकरघा)
4. 3 हस्तशिल्प से गैर सरकारी विषय विशेषज्ञ 
केन्द्रीय स्तरीय चयन समिति के सदस्य
1. सचिव के अध्यक्ष (कपड़ा)
2. विकास आयुक्त (हस्तशिल्प)
3. विकास आयुक्त (हथकरघा)
4. अध्यक्ष / प्रबंध निदेशक
5. अध्यक्ष / प्रबंध निदेशक, एचएचईसी सदस्य
6. कार्यकारी निदेशक, सदस्य / निफ्ट प्रवर्तन निदेशालय
7.  4 अन्य विषय विशेषज्ञ
दलाल अब भी सक्रीय
हालांकि प्रदेश स्तर पर प्राप्त प्रविष्ठियों के अनुसार राष्ट्रीय पुरस्कारों की दौड़ में शामिल शिल्पों का चयन किया जा चुका है। अब जो कुछ होना है इन चुनिंदा आयटमों में से ही होना है, फिर भी प्रदेश में खासकर जयपुर में ऐसे दलाल सक्रीय हैं जो शिल्पियों को यह बोल कर झांसा दे रहे हैं कि वे अब भी कृतियां सीधे दिल्ली भिजवा सकते हैं। ये वहीं दलाल हैं जो प्रदेश स्तर के चयन से पूर्व भी जयपुर के कुछ शिल्पियों को दिल्ली ले जाकर अधिकारियों से मिलवाते और उनकी सेवा-पूजा कराते रहे हैं। इन्हीं दलालों ने प्रदेश स्तर पर चुने जा चुके शिल्पियों को दिल्ली में मुख्यालय और केन्द्रीय स्तरीय चयन समिति में आगे बढ़ाने के लिए लेन-देन की बातें चला रखी हैं। यह बात भी फैलाई जा रही है कि प्रदेश स्तर चुनी जा चुकी कुछ कृतियों को अधिकारी स्तर पर हटाया जा सकता है तो कुछ को नए सिरे से चुना भी जा सकता है।
उधर डीसीएच सूत्रों के अनुसार इस बार पुरस्कारों के लिए होने वाले चयन में काफी पारदर्शिता बरती जा रही है। जयपुर और दिल्ली के कार्यालयों को स्पष्ट निर्देश दिए गए है कि वे दफ्तर के भीतर और बाहर सक्रीय ऐसे लोगों पर कड़ी नजर रखें और मुख्यालय को उनकी सूचना भी दें।
प्रदेश स्तर पर चयन के समय दिल्ली से आए खुल्लर नामक व्यक्ति की गतिविधियों की चर्चा जयपुर से दिल्ली तक अब भी हो रही है। जयपुर के स्थानीय दलालों के जरिए शराब, कबाब और नगद पैसों की भेंट लेने वाले  उन व्यक्ति विशेष और दिल्ली की एक महिला अधिकारी की गतिविधियां भी उच्चाधिकारियों की नजर में हैं। बताया जा रहा है कि प्रदेश स्तर पर चुनी गई कृतियों के बारे में मुख्यालय स्तर पर विचार के समय उन शिल्पियों की सूचि भी सम्मुख रखी जागी जो यहां दलालों और दिल्ली से आए व्यक्ति के सम्पर्क में रहे।
ऐसे आया बदलाव
इस वर्ष प्रदेश स्तर पर गठित चयन समिति के लिए चुने गए पारखी चयनकर्ताओं में सभी निष्पक्ष और गैरतमंद जानकार चुन लिए गए। मूमल को मिली जानकारी के अनुसार चयनकर्ताओं के नाम जाहिर होने के बाद से ही उन्हें सिफारिशी फोन आने शुरू हो गए थे। उसके बाद तोहफों और मिठाई के डिब्बों का सिलसिला चला। चयनकर्ताओं के दरवाजों से रूखी विदाई की जानकारी दिल्ली तक पहुंची। उसके बाद वहां की एक महिला अधिकारी और वरिष्ठ कर्मचारी ने सिफारिशी शिल्पियों को निश्चिंत रहने को कहा और उसके बाद प्रदेश स्तर पर चयन के समय दिल्ली से खुल्लर नामक व्यक्ति का जयपुर आगमन हुआ।
खुल्लर ने यहां खल्लम-खुल्ला चांदी पर मीनाकारी वाले एक फ्लास्क को चुनने के लिए चयनकर्ताओं पर दबाव बनाया, लेकिन जयपुर के दबंग चयनकर्ताओं ने उसकी एक न सुनी।  कहते हैं बाद में खिसियाए हुए खुल्लर ने उद्योग भवन परिसर में उन शिल्पियों से सम्पर्क करना शुरू किया जिनके आयटम सिलेक्ट हो चुके थे। उसने सभी को यह कहा कि चयनकर्ताओं ने तो उनहें रिजेक्ट कर दिया था, लेकिन उसने चयन करा दिया है। इस बात की पुष्ठि जयपुर के दलालों से भी कराई। इसके बदले में शिल्पियों से शराब की बोतल, पुखराज जैसे कुछ नगीनों की मांग की गई। उनके झांसे में आए कुछ शिल्पियों ने तो हाथों-हाथ बोतलें खरीद कर दीं।
इस बात से चयनकर्ता और अधिक चिढ़ गए और उन्होंने दिल्ली से आए व्यक्ति की दिल्ली कार्यालय में  शिकायत करने के लिए एक पत्र भी तैयार कराया..... जो अभी तक भेजा नहीं गया है। बताया जा रहा है कि दिल्ली में मुख्यालय स्तरीय चयन के रवैये को देखकर उसे प्रेषित किया जाएगा।

रविवार, 16 सितंबर 2012

RUDA Craft fare washed by Rain


रुडा के क्राफ्ट बाजार मे भरा पानी निकलते लोग  
रूडा मेले पर बरसात ने पानी फेरा
मूमल नेटवर्क, जयपुर। प्रदेश में सामान्य से अधिक हो रही बारिश का ध्यान रखे बगैर पूर्व निर्धारित तिथियों के अनुसार क्राफ्ट बाजार लगा दिए गए। नतीजा ये कि जहां बारिश का ध्यान रखते हुए व्यवस्थाएं की गई वहां नुक्सान नहीं हुआ, जबकि रूडा जैसे संस्थानों द्वारा आयाजित शिल्प मेले में देश के विभिन्न स्थानों से आए दस्तकारों को नुक्सान उठाना पड़ा।
शानिवार 15 सितम्बर 2012 को कुछ देर के लिए हुई बारिश ने ही जयपुर के जवाहर कला केन्द्र के शिल्प ग्राम में पानी भर दिया। यहां रूडा की और से एक दिन पहले ही शुरू हुए क्राफ्ट बाजार में आए शिल्पियों को इससे काफी नुक्सान हुआ। वर्षा के कारण जहां बाजार में ग्राहक नहीं आए वहीं स्टालों में पानी भर जाने से उनके सामान भीग गए। स्टालों के सामने से पानी निकालने के लिए लोगों को काफी मशक्कत करनी पड़ी।

बिड़ला ऑडिटोरियम मे सिल्क कलेक्शन     
दूसरी ओर बिड़ला ऑडिटोरियम में देशभर से आए आर्टिजन ने सिल्क के साथ एक्सपेरिमेंट कर बनाया यूनिक कलेक्शन पेश किया गया। यहां बरसात के कारण ग्राहक कम नजर आए, लेकिन पानी के कारण आर्टिजन को शिल्पग्राम जैसा नुक्सान नहीं उठाना पड़ा। शनिवार 15 सितम्बर 2012 को ही बिड़ला ऑडिटोरियम में सिल्क उत्सव शुरू हुआ। इसमें असम, बंगाल और बिहार के सिल्क में कई नए कलेक्शन डिसप्ले किए गए हैं। वर्क, डिजाइंस और कलर्स पैटर्न के साथ आउटफिट्स को अधिक आकर्षक बनाया गया है। सिल्क में ये बदलाव यूथ के टेस्ट को देखते हुए किए गए हैं। ताकि फैशन और स्टाइल में सिल्क पीछे ना रहे, बदलाव में परंपरागत सिल्क की खूबसूरती को बरकरार रखा गया है।
पार्टी और शादियों में पहने जाने वाले आउटफिट्स को भी डिजाइनर साड़ी में तैयार किया गया है। जरी वर्क और असली सिल्वर वर्क जिसे अम्बॉज कहा जाता है। इसके रफ मेटेरियल को ज्यों का त्यों रखा जाता है, ताकि आधुनिकता के साथ परंपरागत का बेहतर तालमेल रहे। इसके हैवी वर्क और डिजाइनर के कारण इसकी कीमत 18,000 से 40,000 रुपए तक है।
सांगानेरी, बगरू और गुजरी प्रिंट अब सिल्क में नजर आए। सिल्क को अधिक कलरफुल बनाने के लिए इन प्रिंट्स का इस्तेमाल किया गया है। काथा, भागल और असम की मलबरी सिल्क पर विभिन्न प्रिंट्स का प्रयोग किया गया है। साथ ही आरी वर्क और थ्रेड वर्क किया गया है। इनकी कीमत 1400 से 6000 तक है।
सिल्क को कई रंगों और स्टाइल में ढालने के लिए वेस्टर्न स्टाइल का प्रयोग किया गया है। यह सिल्क पर नेट की साड़ी तैयार की गई। है इसे तैयार करने में 15 दिन लगते हैं, क्योंकि इसे आर्टिजन पूरी तरह से हाथ से तैयार करते हैं। इससे इसमें किसी तरह का डिफेक्ट नहीं आता। इसे सुपर नेट नाम दिया गया है। जरी का वर्क कर इसे डिजाइनर बनाया गया है। इसकी कीमत 8000 से शुरू होती है।
 अगर आप अन्य शिल्प मेलों के बारे में और जानकारी चाहते हैं तो नीचे '  टिप्पणी ' पर क्लिक करके अपनी जरूरत के बारे में लिखें, अपना ई-मेल या पता दें तो हम सीधे आपको पूरा कलन्डर भिजवा सकते हैं। जाहिर है, नि:शुल्क।

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

शिल्प समर्पित दिलीप बैद

'मूमल' ब्लॉग के शिल्प जगत को समर्पित पृष्ठों के मानद संपादक का दायित्व वहन करने वाले श्री दिलीप बैद का जन्म नागौर जिले के लाडनू कस्बे में 5 अप्रेल 1965 के दिन हुआ। परिवार का व्यवसाय आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में था। वहीं उनकी शिक्षा दीक्षा हुई। पहली जुलाई 1989 को सौभाग्यवती मंजू और दिलीप जीवन साथी बने। ससुराल पक्ष चूंकि क्राफ्ट व्यवसाय से जुडा था, इसलिए उन्हें इस व्यवसाय को समझने का मौका मिला।
क्राफ्ट व्यवसाय में कदम रखते हुए वह राजस्थान के जोधपुर में 1991 में आए और 1993 तक रहे। इसके बाद जयपुर आकार व्यवसाय को अपनी मेहनत के बल पर सफलता की ऊंचाईया प्रदान की। राजस्थान के क्राफ्ट को निर्यात के स्तर तक पहुंचाने का श्रेय इन्हें जाता है।बड़ी से बड़ी बात भी बहुत नपे-तुले सीमित शब्दों में व्यक्त करने में कुशल दिलीप बैद का नाम आज क्राफ्ट की दुनियां में एक ब्रांड की तरह स्थापित है। यही कारण है कि क्राफ्ट जगत के देशी-विदेशी बड़े से बड़े आयोजन में इनके हस्ताक्षर ही क्राफ्ट की बेस्ट क्वालिटी की पहचान होते हैं।
क्राफ्ट के क्षेत्र में नए-नए प्रयोग करने में रूचि रखने वाले दिलीप जी की दिलीप टे्रडिंग कंपनी भारत की जानी पहचानी क्राफ्ट निर्यातक कम्पनी के रूप में देश-विदेश में विख्यात है।अपने व्यवसाय के साथ-साथ दिलीप फोरेक्स , ईपीसीएच आईआई सी डी, सी डी सी के शीर्ष व महत्वपूर्ण पदों की भी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। सामाजिक रूप से वह राजस्थान के गांव में चिकित्सा ,शिक्षा, आपूर्ति सम्बन्धी कई योजनाओं पर अपना सक्रिय योगदान दे रहे है। क्राफ्ट की बेस्ट क्वालिटी की तरह दिलीप बैद के हस्ताक्षर के साथ अब 'मूमल' भी गुड और बैटर की स्थिति को पार करते हुए बेस्ट की ओर बढऩे जा रही है।
क्राफ्ट के क्षेत्र में आने वाले युवाओं के लिए उनका संदेश है कि ''वे बड़ी संख्या में इस क्षेत्र में आएं, क्योंकि यही एक ऐसा क्षेत्र है, जहां रोजगार के साथ-साथ उन्हें अपनी क्रिएटिविटी दिखाने का मौका मिलता है। क्राफ्ट की संभावनाओं पर नए प्रयोग कर वह राजस्थान को और आगे बढ़ा सकते है।"

मंगलवार, 2 जून 2009

बागोर की हवेली में हस्तशिल्प संग्रहालय


उदयपुर में पिछोला झील के किनारे तथा प्रसिद्ध जगदीश मंदिर से करीब सौ मीटर की दूरी पर गणगौर घाट पर स्थित बागोर की हवेली संग्रहालय बनाया गया है। बागोर की हवेली के ऐतिहासिक महत्व को ध्यान में रखते हुए तथा इसे प्राचीन स्वरूप में पुर्नस्थापित करने के लिए 1992 में इसके कायाकल्प का निर्णय लिया गया। संग्रहालय की स्थापना का मुख्य ध्येय मेवाड़ के राजसी वैभव को हवेली संस्कृति के प्रतीक रूप में दर्शाना है। इन कक्षों मे दैनिक उपयोग की वस्तुएं अलंकार-मंजूषा, सांप-सीढ़ी व चौपड़ जैसे खेल, हस्तचालित पंखे, गुलाब जल छिड़कने का यंत्र, तांबे के पात्र व अन्य घरेलु वस्तुएं इस संग्रहालय में प्रदर्शित की गई है।लगभग 75 लाख रूपये व्यय करने तथा पांच वर्ष के अथक प्रयासों के बाद, पारंपरिक आराईश पद्धति के प्रयोग व स्थानीय लोगों के कौशल से हवेली का उसके मूल स्वरूप में पुनरूद्धार किया गया, जिसमें हवेली में 19वीं व 20वीं शताब्दी में निर्मित भित्तिचित्रों को पारंपरिक एवं रासायनिक प्रक्रिया द्वारा चूने की परतों से उकेर कर दृश्यमान करना, दरवाजो, खिडकियों व रंग-बिरंगे कांच जड़ित जालीदार झरोखों की मरम्मत उल्लेखनीय है। इस संग्रहालय को राजसी वैभव देने के लिए राजपरिवार से जुड़े लोगों की सहायता ली गई। इसमें रानी के महल (जनाना महल) की भीतरी सज्जा को दर्शाया गया जिसमें बैठक कक्ष, शनय कक्ष, स्नानागार, श्रृंगार कक्ष, आमोद-प्रमोद कक्ष, पूजाघर तथा रसोईघर, राजमाता का कक्ष सुसज्जित किए गए है।
मुख्य आकर्षण
- शहर की सर्वश्रेष्ठ वास्तुशिल्प

-हवेली - राजसी वैभव एवं हवेली संस्कृति का प्रतीक दर्शन

- कांच जड़ित कार्य

-भित्ति चित्र

समय - प्रात: 10 ।00 से सायं 7।00 बजे तक

शुल्क - विदेश 25- रूपये, वयस्क 15- रूपये, बालक 7- रूपये

गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

पुरी के एक शिल्पी की पुरानी कहानी


पुरी के एक साधारण मुहल्ले में कई कारीगरों का घर है । ये लोग अब जगन्नाथ जी की छोटी-छोटी मूर्तियाँ बनाते हैं या घर, आँगन में लगाये जाने वाले पत्थर काटकर दिन में बारह-चौदह आना कमा लेते हैं । इन्हीं में एक व्यक्ति का नाम था राम महाराणा। देखने में सुशील व सिर पर लम्बे बाल रखे हुए वह छोटी उम्र का ही था । उसे गीत गाना व यात्रा करना अच्छा लगता था । राम के साथ मेरा परिचय अचानक ही हुआ । कला के शौकीन एक सज्जन कोणार्क के मन्दिर में कुछ मूर्तियों की नक़ल बनाने के लिए राम को साथ लेकर गये थे । वहीं राम से मेरी पहली बातचीत हुई ।

राम के हाथ की दक्षता को देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ । छेनी के भाँति कई यन्त्रों से राम थोड़ी ही देर में आश्चर्यजनक शीघ्रता के साथ पत्थर के एक टुकड़े को सजीव रुप दे देता था । वास्तव में इन मूर्तियों का आदर नहीं था । लगता था कि लोग जगन्नाथ की मूर्ति चाहते हैं, परन्तु पुरी के मन्दिर पर नर-नारी के काम-भाव की जो मूर्तियाँ हैं, लोग चुपके-चुपके उसकी प्रतिकृति बनवा लेते थे । इसी से राम को थोड़ा-बहुत पैसा मिल जाता था । शिल्पशास्र की विद्या सीखने में राम के घर प्राय: जाया करता था । बातचीत होने पर पता चला कि वास्तव में राम एक गुणी व्यक्ति है । यद्यपि वह अश्लील मूर्तियाँ बेचकर खाता है तथापि मात्र खाता भर है, यह नहीं कहा जा सकता । वास्तव में उसके प्राण शिल्प के कारण ही कंगाल थे । वह स्वयं एक शिल्पी का पुत्र था । छोटी ही उम्र में वह छेनी और हथौड़ी पकडऩा सीख गया था । जिस प्रकार से उसके पूर्वजों ने पुरी या भुवलेश्वर के मन्दिरों का निर्माण किया था, उसी कौशल से कुछ उसने वंश परम्परानुसार सीखा, परन्तु अन्य देशों के शिल्प वास्तव में जितने सुन्दर थे, उतने ही सहज रुप में उसे आकृष्ट करते थे ।

एक दिन विदेशियों के पास मूर्तियों के अनेक चित्र देखकर राम खुशी से उछल पड़ा । वह बोला, 'भैया, एक बार मुझे कलकत्ता ले चलो । मैं इसी प्रकार की मूर्ति बनाना सीखूँगा।' मैंने उससे पूछा, 'जो शिल्प तुम जानते हो, वही क्या कम है ? तुम क्यों दूसरों का शिल्प सीखोगे ?' राम द:खी होकर बोला, 'यह तो कोई नहीं चाहता भैया । देखिए न, विदेशी लोग कितनी खऱाब मुर्तियाँ पाँच रुपया देकर खरीदते हैं और हमारी मूर्ति खरीदते समय दस आना देंगे या नौ आना देंगे, इसी को लेकर झगड़ा करते हैं । कहते हैं, नौ आना ही तो काफ़ी है और इसे बनाने में समय ही कितना लगा है ।' राम महाराणा के हृदय में समाज का यह दोहरा भाव हमेशा काँटे की तरह चुभता था। अपना शिल्प बहुत अच्छा है, इस विषय में उसे कोई सन्देह नहीं था, परन्तु औरों का शिल्प खऱाब है, उसके मन में ऐसा कभी नहीं लगा । शहर के सम्पन्न लोग देशी या विदेशी शिल्प के बिन्दु-विसर्ग को बिना समझे धन के अंधकार में मत्त होकर मात्र विदेशी वस्तुओं को घर में टाँगते हैं, वह यही सहन नहीं कर पाता था । इसीलिए बड़े लोगों पर वह एक तरह से कुपित रहता था । वास्तव में मनुष्य के थोड़े प्रेम और थोड़े सम्मान के लिए राम तरसता था ।

एक दिन अचानक शाम को मेरे घर आकर राम ने एक हारमोनियम माँगा । मेरे पास हारमोनियम कहाँ था ? अंतत: एक पड़ोसी के घर से हारमोनियम लाया और तब राम उस अँधेरी रात की निस्तब्धता को तोड़कर कई लोगों को साथ मिलकर विविध प्रकार की दुर्बोध्य तान छेडऩे लगा । बीच-बीच में राम के उत्पात को इसी प्रकार सहन करना पड़ता था । बीच-बीच में राम कहता,परन्तु भद्र लोगों से मिलने पर भी तो वे खाने को देते नहीं । इसीलिए राम को पैसा कमाने का प्रयास करना पड़ता था । कलकत्ते में मेरे कई मित्रों ने राम की बनाई मूर्ति को देखकर उन्हें खऱीदने की इच्छा प्रकट की थी । राम मूर्ति बनाकर मेरे पास रख जाता था । मैं भी समय देखकर उन्हें मित्रों और रिश्तेदारों के गले बाँध देता था । फिर भी इस तरह से अधिक आमदनी नहीं होती थी । इसमें कभी आमदनी होती तो कभी एक पैसा भी नहीं जुटता, परन्तु इससे राम के कार्य करने का उत्साह दोगुना बढ़ गया । भुवनेश्वर के प्राचीन मन्दिरों पर जितनी अपूर्व मूर्तियों, पत्तों व लताओं की सजावट है, वह इसी की नक़ल बनाने लगा 'भैया, जानते हैं हाथ में काम आने पर मन कैसा लगता है ? सारे पुरी शहर में घर-द्वार जहाँ कहीं भी जो कुछ भी हैं, सबके मैं अपने शिल्प से भर सकता हूँ ।' उसके उत्साह को देखकर मुझे अच्छा भी लगता था और दु:ख भी होता था । मुझे लगता कि क्या कोई इनका आदर करेगा या कोई इन्हें बचाकर रखेगा ?

एक दिन शाम को मैं घर में बैठकर कुछ कर रहा था, तभी राम बाबू हाजिर हुए । उनका मुँह उतरा हुआ था । उनके चेहरे को देखकर कुछ संदिग्ध लगा । बिना और कुछ बोले वह अपनी गढ़ी हुई मूर्तियाँ वापस माँगने लगा । उसके दो-एक दिन पहले राम एक बार पैसे के लिए घर आया था, परन्तु कोई भी मूर्ति न बिक सकने पर मैं उसे कुछ भी नहीं दे सका था । आज उसके चेहरे के भाव को देखकर मुझे कुछ पूछने का साहस नहीं हुआ । मैंने भीतर की अलमारी से मूर्तियाँ निकालकर राम के हाथ में दे दी । राम ने चुपचाप उन्हें उठाकर दूर कँटीली झाडिय़ों मे फेंक दिया। उसके इस कार्य को देखकर मैं कुछ नहीं बोल सका । वह भी जैसे आया था, वैसे ही लौट आया ।

अगले दिन शाम को राम महाराणा मेरे घर आया । मैंने देखा कि वह घर के दरवाजे पर बैठ कर तन्मय होकर एक मूर्ति बना रहा है । मुझे देखकर लज्जावश पहले तो उसने कुछ नहीं कहा, परन्तु उसके बाद जब मैंने पिछली रात वाली घटना की बात उठायी तो वह हिचक-हिचक कर रोने लगा । काफ़ी देर बाद मैं समझ पाया कि किसी ने उसके भाई को किसी काम के लिए कुछ रुपया उधार दिया था और इसीलिए कल उसने उसके भाई को अपमानित किया । इसी घटना से मर्माहत होकर उसने अपनी सारी मूर्तियों को तोड़ दिया । राम दु:खी होकर बोला, 'कोई भी हमारा काम पसन्द नहीं करता। जो सीढ़ी का पत्थर बनाते हैं, वे भी बारह आना पाते हैं और मैं मूर्ति गढऩे पर भी बारह आना नहीं पाता ।' इसी दु:ख से राम पागलों की तरह हो गया था । समाज से उसे कोई प्यार या आदर नहीं मिला । उस पर शायद राम को लोभ भी था, परन्तु देश के लोग तो उसे खाने तक को नहीं देते । वह अपनी बात को ठीक प्रकार से नहीं कह पाता, ऐसा कहकर निष्ठुर भाव से वे घर आकर अपमान करके चलो जाते हैं । वही राम से मेरी अन्तिम भेंट थी ।

उसके बाद बहुत दिनों तक इसी तरह मैं देश-विदेश घुमता रहा । बहुत दिनों बाद जब पुन: मैं लौटकर वहाँ आया तो मैंने सुना कि राम महाराणा की मृत्यु हो गई । पाथुरिया मुहल्ले के एक शिल्पी ने बताया कि बहुत दिनों तक लगातार धतूरा खाकर राम ने एक तरह से आत्म-हत्या ही कर ली । राम के घर पर उसकी विधवा स्री सुबह-सुबह दरवाज़े पर गोबर लीप रही थी । मुझे देखकर, घूँघट काढ़कर उसने मुझे प्रणाम किया । परन्तु क्या हुआ था यह पूछने की मेरी और इच्छा नहीं हुई ।

('शिल्पी' से साभार)

शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

बौद्ध कला की बेमिसाल कृतियां

सांची के स्तूप दूर से देखने में भले मामूली अ‌र्द्ध गोलाकार संरचनाएं लगें लेकिन इसकी भव्यता, विशिष्टता व बारीकियों का पता सांची आकर देखने पर ही लगता है। इसीलिए देश-दुनिया से बडी संख्या में बौद्ध मतावलंबी, पर्यटक, शोधार्थी, अध्येता इस बेमिसाल संरचना को देखने चले आते हैं। सांची के स्तूपों का निर्माण कई कालखंडों में हुआ जिसे ईसा पूर्व तीसरी सदी से बारहवीं सदी के मध्य में माना गया है। ईसा पूर्व 483 में जब गौतम बुद्ध ने देह त्याग किया तो उनके शरीर के अवशेषों पर अधिकार के लिए उनके अनुयायी राजा आपस में लडने-झगडने लगे। अंत में एक बौद्ध संत ने समझा-बुझाकर उनके शरीर के अवशेषों के हिस्सों को उनमें वितरित कर समाधान किया। इन्हें लेकर आरंभ में आठ स्तूपों का निर्माण हुआ और इस प्रकार गौतम बुद्ध के निर्वाण के बाद बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार इन स्तूपों को प्रतीक मानकर होने लगा।
सांची की स्थापना
बौद्धधर्म व उसकी शिक्षा के प्रचार-प्रसार में मौर्यकाल के महान राजा अशोक का सबसे बडा योगदान रहा। बुद्ध का संदेश दुनिया तक पहुंचाने के लिए उन्होंने एक सुनियोजित योजना के तहत कार्य आरंभ किया। सर्वप्रथम उन्होंने बौद्ध धर्म को राजकीय प्रश्रय दिया। उन्होंने पुराने स्तूपों को खुदवा कर उनसे मिले अवशेषों के 84 हजार भाग कर अपने राज्य सहित निकटवर्ती देशों में भेजकर बडी संख्या में स्तूपों का निर्माण करवाया। इन स्तूपों को स्थायी संरचनाओं में बदला ताकि ये लंबे समय तक बने रह सकें।
सम्राट अशोक ने भारत में जिन स्थानों पर बौद्ध स्मारकों का निर्माण कराया उनमें सांची भी एक था जिसे प्राचीन नाम कंकेनवा, ककान्या आदि से जाना जाता है। तब यह बौद्ध शिक्षा के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हो चुका था। ह्वेन सांग के यात्रा वृत्तांत में बुद्ध के बोध गया से सांची जाने का उल्लेख नहीं मिलता है। संभव है सांची की उज्जयनी से निकटता और पूर्व से पश्चिम व उत्तर से दक्षिण जाने वाले यात्रा मार्ग पर होना भी इसकी स्थापना की वजहों में से रहा हो। सम्राट अशोक की महारानी चन्द्र विदिशा के एक व्यापारी की पुत्री थीं जहां से सांची की पत्थर युक्त पहाडी दिखाई देती थी। सांची का उस दौर में कितना महत्व रहा होगा इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अशोक के पुत्र महेंद्र व पुत्री संघमित्रा श्रीलंका में धर्म प्रचार पर जाने से पूर्व यहां मठ में रहते थे जहां पर उनकी माता का भी एक कक्ष था।
हर धर्म की भांति बौद्ध कालीन संरचनाओं को उनकी मान्यताओं के अनुसार बनाया गया। बौद्धधर्म में ईश्वरवादी सिद्धांत के स्थान पर शिक्षाओं का महत्व है। इन संरचनाओं में मंदिर से परे स्तूप एक नया विचार था। स्तूप संस्कृत व पाली से निकला माना जाता है जिसका अर्थ होता है ढेर। आरंभ में केंद्रीय भाग में तथागत [महात्मा बुद्ध] के अवशेष रख उसके ऊपर मिट्टी पत्थर डालकर इनको गोलाकार आकार दिया गया। इनमें बाहर से ईटों व पत्थरों की ऐसी चिनाई की गई ताकि खुले में इन स्तूपों पर मौसम का कोई प्रभाव न हो सके। स्तूपों में मंदिर की भांति कोई गर्भ गृह नहीं होता। अशोक द्वारा सांची में बनाया गया स्तूप इससे पहले के स्तूपों से विशिष्ट था।
बौद्ध कला की सर्वोत्तम कृतियां
सांची में बौद्ध वास्तु शिल्प की बेहतरीन कृतियां हैं जिनमें स्तूप, तोरण, स्तंभ शामिल हैं। इनमें स्तूप संख्या 1 सम्राट अशोक द्वारा बनवाया गया था जिसमें महात्मा बुद्ध के अवशेष रखे गए। करीब में यहां पर दो अन्य छोटे स्तूप भी हैं जिनमें उनके दो शुरुआती शिष्यों के अवशेष रखे गए हैं। पहले स्तूप की वेदिका में जाने के लिए चारों दिशाओं में तोरण द्वार बन हैं। पूरे स्तूप के बाहर जहां पहले कठोर लकडी हुआ करती थी आज पत्थरों की रेलिंग है। अंदर वेदिका है व कुछ ऊंचाई तक जाने के लिए प्रदक्षिणा पथ है। स्तूप के गुंबद पर पत्थरों की वर्गाकार रेलिंग [हर्मिका] बनी है व शिखर पर त्रिस्तरीय छत्र है।
स्तूप की वेदिका में प्रवेश के लिए चार दिशाओं में चार तोरण [द्वार] हैं। पत्थर से बने तोरणों में महात्मा बुद्ध के जीवन की झांकी व जातक प्रसंगों को उकेरा गया हैं। यह कार्य इतनी बारीकी से किया गया है के मानो कारीगरों ने कलम कूंची से उनको गढा हो। इस स्तूप के दक्षिणी तोरण के सामने अशोक स्तंभ स्थापित है। इसका पत्थर आस-पास कहीं नहीं मिलता है। माना जाता है कि 50 टन वजनी इस स्तंभ को सैकडों कोस दूर चुनार से यहां लाकर स्थापित किया गया। यहां पर एक मंदिर के अवशेष है जिसे गुप्तकाल में निर्मित माना गया है। सांची के स्तूपों के समीप एक बौद्ध मठ के अवशेष हैं जहां बौद्ध भिक्षुओं के आवास थे। यही पर पत्थर का वह विशाल कटोरा है जिससे भिक्षुओं में अन्न बांटा जाता था। यहां पर मौर्य, शुंग, कुषाण, सातवाहन व गुप्तकालीन अवशेषों सहित छोटी-बडी कुल चार दर्जन संरचनाएं हैं।
शुंग काल में सांची में अशोक द्वारा निर्मित स्तूप को विस्तार दिया गया जिससे इसका व्यास 70 फीट से बढकर 120 फीट व ऊंचाई 54 फीट हो गई। इसके अलावा यहां पर अन्य स्तूपों का निर्माण कराया। सांची में इन स्तूपों का जीर्णोद्धार लंबे समय तक चला जिसमें इसे अद्वितीय बनाने के लिए कल्पना शक्ति का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद शुंग व कुषाण नरेशों ने अपने काल में यहां पर अन्य स्तूप निर्मित करवाए।
मौर्य, शुंग, कुषाण सातवाहन व गुप्तकाल तक बौद्ध धर्म फलता फूलता रहा किन्तु इनके पतन के उपरांत राजकीय कृपादृष्टि समाप्त होने से बौद्ध धर्म का अवसान होने लगा। लेकिन बाद के शासकों ने बौद्ध स्मारकों व मंदिरों को यथावत रहने दिया। सांची की कीर्ति राजपूत काल तक बनी रही किंतु पहले तुकरें के आक्रमण और बाद में मुगलों की सत्ता की स्थापना के बाद यह घटने लगी। औरंगजेब के काल में बौद्ध धर्म का केंद्र सांची गुमनामी में खो गया। उसके बाद यहां चारों ओर घनी झाडियां व पेड उग आए।
19वीं सदी में कर्नल टेलर यहां आए तोउन्हें सांची के स्तूप बुरी हालत में मिले। उन्होंने उनको खुदवाया और व्यवस्थित किया। कुछ इतिहासकार मानते हैं उन्होंने इसके अंदर धन संपदा के अंदेशे में खुदाई की जिससे इसकी संरचना को काफी नुकसान हुआ। बाद में पुराविद मार्शल ने इनका जीणरेंद्घार करवाया। चारों ओर घनी झाडियों के मध्य सांची के सारे निर्माण का पता लगाना और उनका जीणरेंद्वार कराके मूल आकार देना बेहद कठिन था, किंतु उन्होंने बखूबी से इसकी पुरानी कीर्ति को कुछ हद तक लौटाने में मदद की।
धर्म व पर्यटन का संगम
1989 में यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल होने के बाद से सांची का महत्व बहुत बढा। बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र होने के कारण यहां पर देशी व विदेशी मतावलंबियों का जमावडा लगा रहता है। सांची की भव्यता को देखने को प्रतिदिन हजारों पर्यटक पहुंचते हैं जिनमें विदेशी सैलानियों की बडी संख्या होती है। इस सारे परिसर के प्रबंधन व संरक्षण का कार्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन है। यहां का पुरातत्व संग्रहालय भी दर्शनीय है। आरंभ में वर्ष 1919 में इसे स्तूपों के निकट बनाया गया था किंतु जैसे-जैसे सामग्री की प्रचुरता होने लगी इसे 1986 में सांची की पहाडी के आधार पर नए संग्रहालय भवन में स्थानांतरित कर दिया गया। इस संग्रहालय में मौर्य, शुंग, सातवाहन, कुषाण, गुप्त कालीन प्रस्तर कला के अवशेष, मूर्तियां, शिलालेख आदि देखने को मिलते हैं। सांची के इन स्मारकों की भव्यता तो आगन्तुकों को चमत्कृत करती ही है, साथ में यहां का शांत वातावरण हर आने वाले को महात्मा बुद्ध के शांति के संदेश को समझाने में मदद देता है।

मंगलवार, 6 जनवरी 2009

हड़ताल से हजारों हेंडी क्राफ्ट आर्टीजन फंसे

ट्रक आपरेटरों के देशव्यापी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाने से हेंडी क्राफ्ट मेलों के कारोबार से जुड़े हजारों आर्टीजन अपने ठिकानों से बाहर जाकर फंस गए है। इनदिनों राजस्थान में ही कम से कम छ हजार से अधिक शिल्पी अटके हुए है। मेलों और प्रदर्शनियों के समापन के बाद वे अपना सामान अन्यत्र नहीं ले जा पा रहे। उधर जिंसों एवं खान-पान की कीमतों में बढ़ोतरी होने के कारण उन्हें भारी नुकसान होने की भी आशंका है। हड़ताली ट्रक मालिकों के मुद्दे सुलझाले के लिए सरकार की तरफ से कोई गंभीर पहल नहीं हुई है। हमारी भूतल परिवहन मंत्रालय के साथ शनिवार और रविवार को बैठकें हुई थी, लेकिन इसमें कोई परिणाम नहीं निकला।
डीजल की कीमतों में दस रुपये लीटर की कमी किए जाने और कुछ अन्य मांगों को लेकर केंद्र सरकार के साथ बातचीत विफल होने के बाद विभिन्न राज्यों में ट्रक आपरेटरों ने माल ढुलाई रोक दी है।
इस हड़ताल में ट्रक आपरेटरों की 4000 एसोसिएशन शामिल हैं। हड़ताल अगर चार-पांच दिन तक जारी रहती है तो इससे आवश्यक वस्तुओं की कीमतें उछल जाएंगी और शिल्पिओं को भी नुकसान होगा।
ट्रक मालिकों ने डीजल सस्ता करने के साथ ही टायर के अधिक मूल्य परमिटों की समस्या को दूर करने की लेकर सरकार से इस क्षेत्र के लिए भी सहायता पैकेज जारी करने की मांग की है।
अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी गिरावट के मद्देनजर डीजल की कीमत में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की मांग है। ट्रक मालिकों ने डीजल पर सामान चार फीसदी का मूल्य वर्धित कर [वैट] लगाए जाने नए मोटरवाहन अधिनियम में पंजीकरण और रिटर्न दाखिल किए जाने के प्रावधान खत्म करने तथा राष्ट्रीय स्तर के परमिट [एनपी] के शुल्क को 5000 रुपये से घटाकर 1500 रुपये करने की मांग की है।

बुधवार, 24 दिसंबर 2008

2008 - A memorable year for Indian art

Just over a decade ago it would have been difficult to imagine the scale of global interest currently generated by Indian art, a phenomenon that has been reflected in the record prices fetched in sales of artworks.While art markets in the US, UK and several other countries have taken a blow with top auction houses like Christie's and Sotheby's selling below estimated prices, Indian artists together with their Chinese counterparts have been able to sufficiently weather the storm so far.The art market in India growing at 35 per cent today stands at approximately over Rs 1500 crores. In the European circuit, Indian art today commands a value, which is 300-400 per cent higher than what it was 4 to 5 years ago.The year 2008 has been one of many firsts in the country for the art market. In its very first year the 'India Art Summit'- the first art fair in the country modelled on the likes of international fairs such as Basel Art Fair in Spain is said to have attracted over 10,000 art enthusiasts including art collectors, investors, artists, critics, curators and students from across India and overseas."The 34 galleries at fair exhibited over 550 artworks and sold approximately 50 per cent. During the 3 day fair 80 per cent of the exhibitors reported having met new investors from India and overseas," says Gautam of Hanmer MS&L, the communication firm which is hosting the festival.After generating media coverage worth approximately Rs 6 crores in US, UK, UAE and the Asia Pacific, organisers of the IAS say in 2009 they are striving to establish it as a platform for galleries from across the world to showcase an array of art which finds appeal amongst Indian collectors and investors.

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2008

पांच सौ बच्चों के लिए दो वर्षीय स्कालरशिप

परफोर्मिंग आर्ट में नई उमर के बच्चों का रुझान बढाने और उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए भारत सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा दो वर्षीय स्कालरशिप देने का फ़ैसला किया गया है।

इसमें १० से १४ साल के ऐसे बच्चों को दो साल के लिए ७२०० रुपये दिए जायेंगे जो गायन, वादन, डांस, ड्रामा और पेंटिंग में अच्छा कार्य कर रहें हैं। पुरे भारत में कुल ५०० स्कालरशिप दी जाएँगी। आवेदन की अन्तिम तिथि ३१ दिसम्बर २००८ है। जयपुर स्थित दो संस्थाएं क्युरियो और आलाप इसके लिए फ्री काउंसलिंग दे रही हैं।

अगर आप किसी बच्चे के लिए इसमें रूचि लेना चाहें और विस्तृत विवरण चाहते हों तो भारत सरकार के संस्कृति विभाग से सीधे संपर्क कर सकते हैं और इसमे असुविधा हो तो इस ब्लॉग की टिप्पणी सुविधा के जरिए मूमल से भी और जानकारी ले सकतें हैं।

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2008

सर्दी आई खादी लाई

जयपुर में सर्दी ने ज़ोर पकड़ लिया है, हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी खादी के उत्पादों की बिक्री के लिए रामलीला मैदान में राज्य खादी ग्रामोद्योग द्वारा प्रदर्शनी का आयोजन किया गया है । इस प्रदर्शनी का उदघाटन ५ दिसंबर की शाम को किया जाएगा। यह प्रदर्शनी १३ जनवरी २००९ तक चलेगी जिसमे देश भर से आए खादी उत्पादक अपने अपने उत्पादों का प्रदर्शन करेंगे। इसका आयोजक राजस्थान खादी ग्रामोद्योग संस्था संघ जयपुर है । किसी भी पूछताछ के राजस्थान खादी ग्रामोद्योग संस्था संघ , बजाज नगर जयपुर स्थित कार्यालय में संपर्क किया जा सकता है। प्रदर्शनी के प्रायोजक खादी और ग्रामोद्योग आयोग है। कार्यालय के फोन नम्बर हैं ०१४१-२७०७८५०